75 का तन ठहरा हुआ मन
75 की उम्र में मन ठिठका हुआ है। कभी ठहरा हुआ, कभी उलझन में। पिछले कुछ समय में, कुछ मौतें देखीं, अपनों की, परिचितों की। उन्हें देखकर मन ,सहम सा गया । सदमे ने कई सवाल खड़े किए । जिन्हें टालना संभव नहीं रहा । जीवन काल अब कम है । यह सच है और इसी सच के सामने कुछ प्रश्न हैं । क्या करूं, क्या छोडूं ? आध्यात्मिक हो जाना , कोई हल नहीं लगता। कम से कम मेरे लिए तो नहीं । मंत्रों और आश्वासनों से , इन सवालों का उत्तर नहीं मिलता । मन किसी पलायन की नहीं, ईमानदार सामना, करने की मांग करता है । मन बार-बार कहता है , जो सोचा, जो चाहा था, जो रह गया। जिसके लिए समय या साहस नहीं जुटा पाया। उसके लिए फिर से कोशिश करो। पूरे जोर से नहीं,पूरे मन से । हर दिन, जो भी श्रेष्ठ मनोशारीरिक शक्ति, उपलब्ध हो, उसके छोटे-छोटे अंश, प्रयोग में लाओ। कोई बड़ा लक्ष्य नहीं, कोई भारी अपेक्षा नहीं। कुछ हो जाए तो ठीक और ना हो तो भी ठीक । शायद अब जीवन, सिद्धि का नहीं , प्रयोग का समय है। जहां असफलता भी अपमान नहीं, सफलता भी, कोई अनि...